“Letter’s to Delhi…

प्रिय दिल्ली,

ख़त लिखना बहुत पसंद है मुझे। मगर आजकल कोई है ही नहीं जिसे ख़त भेजूँ,आख़िर पढेगा कौन। फ़िर तुम्हारा ख़्याल आया। सोचा,तुमसे ही बांटा जाए कुछ। एक बात कहूँ , बुरा मत मानना, मुझे तुम कभी पसंद नहीं थे। बीस साल से ज़्यादा चले थे तुम मेरे साथ,मग़र एक फासले पर ही रहे मुझसे।मैंने कभी कोशिश नहीं की थी तुम्हारी हथेलियों में झाँकने की, कितने छाले थे वक़्त के उनमें। मुझे तो बस उस वक़्त से शिकायत थी, फ़िर एक नया शहर जो लिख दिया था उसने मेरी उलझनों में। मैंने भी सोच लिया था बस कुछ सालों की बात है, फ़िर पलटकर भी नहीं आऊँगी। तुम्हारी लू की थपेड़ों में जलते दिन,सर्दी में ठिठुरती रातें, किसी कोने में पुराने सामान की तरह मुरझा जाएंगे। तुम्हारे कितने चेहरे हैं, कौन सा तुम हो एक सवाल है। तुम्हारी परतों को खुरचने की ज़रुरत नहीं थी मुझे।मैं तुमसे लड़ती रही और तुम जीतते रहे। जीतने की आदत जो है तुम्हें। कितने आये, तुम्हें सजाया उन्होनें, फ़िर तुम्हारी हवाओं के फ़रेबों में पिघल गए। तुम्हारे रिश्ते तो तवायफ़ों के घुंघरूओं से थे जिसकी खनक में बेवफाई पिरोई गयी है। मैं तुमसे छूटना चाहती थी, तुम मुझे जकड़ते चले गए। तुम्हें दिलवाला कहते है, मुझे तो यह बात बड़ी चुभती है। तुम्हारी ऊंची इमारतों में रहने वाले; कभी ना रुकने वाली सड़कों पर दौड़ते रौंदते लोग; तुम्हारे ख़ामोश कोनों में कितने दर्द के कतरे ग़ुम हैं, क्या तुम्हें पता भी है ? तहज़ीब ने भी अपना पता बदल लिया है, सिर्फ़ कहानीयों में उसके निशान मिलते हैं।फ़िर, वो मिला मुझे। कह रहा था कि तुम वहाँ हो जहाँ कोई जाता नहीं। उसकी आवाज़ में लगा, तुम बोल रहे हो। उसकी आँखों से कहानियाँ बह रही थी। लगा तुम कह रहे हो, थामकर चलो मुझे, कुछ दूर, कुछ देर।मेरी वीरान आँखों की झिल्लियों के पार देखो, कितने पन्ने हैं, सुर्ख और सियाह। वो बोल रहा था और तुम करवट ले रहे थे। कोटला की मिट्टी में, लकड़ी के कोनों से कुछ खाके बना रहा था। उसके अल्फ़ाज़ों से वो खाली खाके भरने लगे। उस दिन तुम्हारे दर्द का एक टुकड़ा मेरी रूह में समा गया। क्या वो कोई जिन्न था? उसकी रूह मैं इश्क़ की लपटें दिखी थीं मुझे। वो मिलाता रहा मुझे तुमसे। मैं तुम्हें उन झरोकों के पार, उन सुर्ख सियाह पन्नों में पाती रही।धुंधली सी खिंची तस्वीरों को पक्का होने में कई महीने लगे हैं। अब मेरी आँखों से कभी कभी तुम बहते हो। कई जज़्बात रिसने लगते है पन्नों पर मेरी उँगलियों से। कितनी बार हुआ है कि, लिखते लिखते रुक जाती हूँ।अल्फ़ाज़ थम जाते हैँ, बेचैन हो जाते हैं। रात को कई बार सवाल ओढ़कर सो जाती हूँ। तुम्हारी जैसी ही परतें मेरी शख़्सियत की झुर्रियों में भी तो बैठी हैं। धीरे धीरे खुद को पा रही हूँ। नए और पुराने, दोनों के साथ रहने की कोशिश कर रही हूँ। पुराना मुझे ज़यादा पसंद है, कहानियां जो सुनाता है मुझे। शिकायतें भी कम हैं अब। मैं आइने में दाग़ ही गिन रही थी, उसके पीछे कितना खूबसूरत सफ़र छिपा है, जान गयी हूँ।इस ख़त को कई बार लिखा है मैंने, कभी कुछ रह गया, कभी कुछ ठीक नहीं लगा। पर इसे भेज रही हूँ ।अच्छा आज यहीं रूकती हूँ। तुम्हें भी कितने काम निपटाने होंगे; कहीं हाकिम, कहीं बादल और कहीं बशर की सिरदर्दी सुलझानी होगी। लेकिन अब यूँ ही इन बातों का सिलसिला चलता रहेगा। अपनी रफ़्तार से कुछ पल बचाकर यूं ही मिलना मुझसे।

तुम्हारे कारवां का
“एक मुसाफ़िर”

#‎Postcards_From_Life‬ #‎Butterfly_Monologues

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *